वेंटीलेटर प्रकरण में जिन पर दोष, सरकार ने उन्हें ही सौंपा जांच का जिम्मा
भरतपुर. सरकारी वेंटीलेटरों को खैरात में निजी हॉस्पिटल को देने के मामले में सरकार भी सच पर पर्दा डालने सरीखा काम कर रही है। अपनों की सलामती और खास पर मेहरबानी के लिए जिन साहब ने तमाम कायदों को किनारे कर दिया। अब जांच का जिम्मा भी उन्हीं ने पूरा किया है। सरकार ने मामले की जांच जिला कलक्टर से कराने की कही है, जबकि वह इस मामले में खुद कठघरे में हैं।
आरबीएम अस्पताल से सरकारी वेंटीलेटरों को शहर के जिंदल हॉस्पिटल को देने के मामले में अधिवक्ता विजय कुमार गोयल की ओर से राजस्थान उच्च न्यायालय में पेश की गई जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। राजस्थान सरकार के महाधिवक्ता एमएस सिंघवी की ओर से शपथ पत्र पेश करने का कथन कर अवगत कराया कि सरकार की ओर से एक जांच कमेटी नियुक्त की गई थी। इसके बाद जिंदल अस्पताल की ओर से ज्यादा वसूल की गई राशि जमा कराई है। इसके विपरीत विजय कुमार गोयल के अधिवक्ता मोहित खंडेलवाल एवं हिना गर्ग की ओर से कोर्ट के समक्ष कहा कि जिंदल हॉस्पिटल की ओर से राज्य सरकार के आदेश की अवहेलना में मरीजों से अत्यधिक राशि वसूल कि जा रही थी। जिनको खुद को ही पार्टी बनाया गया है, उनसे जांच कराने का क्या मतलब है। इसकी न्यायिक जांच कराई जानी चाहिए। राज्य सरकार ने न्यायालय को बताया कि आरबीएम हॉस्पिटल में 60 वेंटीलेटर उपलब्ध कराए गए थे, जिनमें से 40 का उपयोग किया जा रहा था और शेष 20 उपयोग में नहीं आ रहे थे। इसलिए जिंदल हॉस्पिटल के निवेदन पर 27 अप्रेल को 5 वेंटिलेटर उसे उपलब्ध कराए गए। इसके बाद 11 मई को राज्य सरकार की ओर से निर्णय लिया गया कि यदि कोई उपकरण निजी अस्पताल को सरकारी अस्पताल की ओर से दिए जाते हैं तो निजी अस्पताल उसके एवज में कोई राशि मरीजों से प्राप्त नहीं करेगा। इसी क्रम में 13 मई को कलक्टर भरतपुर की ओर से एक जांच कमेटी बनाई गई। कमेटी ने 27 अप्रेल से 13 मई तक जिंदल हॉस्पिटल की ओर से 9 हजार रुपए मरीजों से प्रति दिन वेंटीलेटर सुविधा के लिए प्राप्त किया जाना पाया। इस पर जिंदल हॉस्पिटल ने इस राशि को मरीजों से प्राप्त करना स्वीकार किया और एक लाख 62 हजार रुपए राजस्थान मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी भरतपुर को चेक से भुगतान किया जाना बताया। उच्च न्यायालय की ओर से प्रकरण में राज्य सरकार को अपने शपथ पत्र की प्रति प्राथी एवं अन्य अप्रार्थीगण को उपलब्ध कराने के निर्देश के साथ 26 मई को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही यह भी आदेश दिए गए कि प्रार्थी अपनी याचिका की एक प्रति पुन: अप्रार्थीगण को उपलब्ध कराए। दोनों पक्षों को यह भी आदेश दिए गए हैं के वह अपने-अपने जवाब शपथ पत्र अगली सुनवाई से पूर्व न्यायालय के समक्ष पेश करें।
बड़ा सवाल...जब काम नहीं आए तो वापस क्यों नहीं किए वेंटीलेटर
भले ही हाइकोर्ट में राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए यह कह दिया कि जांच में सामने आया है कि पांच वेंटीलेटर सिर्फ 18 बार उपयोग हुए। इसमें नौ हजार रुपए प्रति वेंटीलेटर के हिसाब से राशि वसूल की गई है। अब सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर संबंधित विभाग, जिला प्रशासन ने जब वेंटीलेटर काम नहीं आ रहे थे तो वापस क्यों नहीं लिए। खुद निजी हॉस्पिटल प्रशासन ने भी वापस क्यों नहीं किए। इससे साफ है कि कहीं न कहीं सच पर पर्दा डाला जा रहा है। खास बात यह है कि गरीबों की जान बचाने के लिए केन्द्र सरकार से आए वेंटीलेटरों को अपनों का इलाज कराया, लेकिन सच सामने आने पर आनन-फानन में 'माननीयÓ की मेहरबानी से सरकार से निजी हॉस्पिटलों को संसाधन देने के आदेश करा दिए। पत्रिका की खबरों के बाद देशभर में सुर्खियां बटोर रहे इस मामले में सरकार ने भी जांच का जिम्मा उन्हें दिया, जो खुद सवालों के घेरे में हैं। जिला कलक्टर की निगरानी में जांच करने वाली कमेटी ने भी वही माना जो जिंदल हॉस्पिटल ने बता दिया। जिंदल हॉस्पिटल ने बताया कि जितने दिन वेंटीलेटर काम आए, उस हिसाब से मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी को राशि दे दी। यदि बाकी दिनों में वेंटीलेटर काम नहीं आए तो हॉस्पिटल संचालक ने उन्हें वापस क्यों नहीं किया। कमेटी ने भी हॉस्पिटल संचालक की बात पर भरोसा कर एक लाख 62 हजार रुपए आरएमआरए के नाम लेकर अपनी ड्यूटी निभा ली, लेकिन जिन मरीजों ने एक दिन के 30 से 35 हजार रुपए खर्च किए, उन्हें राहत देने के कोई प्रयास नहीं किए गए।
source https://www.patrika.com/bharatpur-news/those-who-are-to-blame-are-entrusted-with-the-investigation-6857828/
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